गुरुवार, 11 मई 2023

जैसा करो वैसा भरो!


जैसा करो वैसा भरो!

भलाई का बदला


एक शिक्षाप्रद कहानी,

एक बार की बाय है एक लड़का अपने स्कूल की फीस भरने के लिए एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक कुछ सामान बेचा करता था, 

 एक दिन उसका कोई

सामान नहीं बिका और साथ मे उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी. उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग

लेगा.

* पहला दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाने के उसने पानी का एक 

गिलास माँगा.

*लड़की ने भांप लिया था कि वह भूखा है, इसलिए वह एक...... बड़ा गिलास दूध का ले आई. भुखा होने के कारण लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया.

लडका बोला–

" कितने पैसे दूं?" ----

 

" पैसे किस बात के?"

लड़की ने जवाव में कहा.

"माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर दया करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए." 

लडका बोला–

“तो फिर मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ."

 जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी , बल्कि उसका भगवान् और आदमी पर भरोसा और भी बढ़ गया था

***************

सालों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़

गयी. लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया.

 विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड  केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया. जैसे ही उसने लड़की के कस्बे का नाम सुना, उसकी आँखों में

चमक आ गयी.

**

वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया. उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा.


** उसकी मेहनत और लगन रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी.

डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस लड़की के इलाज का बिल लिया.

 * उस बिल के कौने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया. लड़की बिल का लिफाफा देखकर घबरागयी.

****

उसे मालूम था कि वह बीमारी से तो वह बच गयी है लेकिन बिल कि रकम जरूर उसकी जान ले लेगी.

फिर भी उसने धीरे से बिल खोला, रकम को देखा और फिर अचानक उसकी नज़र बिल के कौने में पैन से लिखे नोट पर गयी.

जहाँ लिखा था, "एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है." नीचे  उस नेक डॉक्टर होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे. 

***

 ख़ुशी और अचम्भे से उस लड़की के गालों पर आंसू टपक पड़े उसने ऊपर कि और दोनों हाथ उठा कर कहा, " हे भगवान..! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..

आपका प्यार इंसानों के दिलों और हाथों के द्वारा न जाने कहाँ- कहाँ फैल चुका है."


*****

अगर आप दूसरों पर.. अच्छाई करोगे तो.. आपके साथ भी.. अच्छा ही होगा ..!

बुधवार, 10 मई 2023

लोग हमें कब पसंद करते है?

 लोग हमें कब पसंद करते है?



[सकारात्मक व्यक्तित्व कैसे बनाएं?]

लोग हमें कब पसंद करते है?

–कुशल व्यवहार:-

लोग आमतौर पर उन लोगों को पसंद करते हैं जो अपने व्यक्तित्व, कौशल और व्यवहार से सकारात्मक होते हैं। आप अपने आस-पास के लोगों के साथ सहयोगी, उदार, समझदार, समर्थक और संवेदनशील रहते हुए एक सकारात्मक दृष्टिकोण और संज्ञानशीलता रखते हुए इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसके अलावा, आप अपने व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने के लिए नए ज्ञान और कौशलों का अध्ययन कर सकते हैं जो आपको अपने काम में मदद करेंगे और आपकी संभावनाओं को बढ़ाएंगे,

– लोगों के प्रति संवेदनशीलता:-

लोगों के साथ संवेदनशील रहना भी आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आपको लोगों के साथ अधिक समझौता करने और उनसे बेहतर संबंध बनाने में मदद करता है। आप अपने आप को समझने और अपने विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को दूसरों के साथ साझा करने के लिए भी खुले रहने का प्रयास करें।

–आपका खुशहाल और सकारात्मक:-

लोग आमतौर पर उन लोगों को पसंद करते हैं जो खुशहाल होते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव करने के लिए प्रयास करते हैं। इसलिए, आप अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए कोशिश करें और खुशहाल और सकारात्मक बनने के लिए समय निकालें। इससे आप खुशहाली और सकारात्मकता की ऊंचाइयों को छूते हुए अपने आस-पास के लोगों के दिलों में जगह बना सकते हैं।

– इसके अलावा, आप अपने काम में मेहनत करते हुए धैर्य और संयम का भी पालन करें। आपका काम और संभावित परिणाम किसी भी क्षेत्र में अच्छा होना चाहिए, चाहे आपका काम आपकी नौकरी हो या आपका व्यवसाय

रविवार, 7 मई 2023

पछतावा|Repentance>> Motivation story


 <<पछतावा|Repentance>>

Motivation story

– एक स्कूल के प्रिंसिपल वर्मा जी जैसे ही घर से स्कूल जाने के लिए निकले , तभी पीछे से उनके पिता ने आवाज लगाई- बेटा , मेरी आँख का ड्रॉप्स खत्म हो गया है, तीन दिन हो गए , तुम ऑफिस से लौटते समय ले आना।

–अपने पिता की ये बात सुन वर्मा जी गुस्सा होते हुए बोले-पापा, कितनी बार कहा है कि जाते समय पीछे से टोका मत करो, अपशगुन होता है।


–पिता बोले-बेटे, तुम इतने पढ़े लिखे होकर भी शगुन-अपशगुन को मानते हो?ठीक है, अब आगे से नही बोला करूँगा।


– वर्मा जी बिना कुछ बोले चल दिये।


–कुछ ही देर में वह एक  विशाल सभा कक्ष में जाकर मंच पर बैठ गए और वहां उपस्थित अधिकारी-कर्मचारियों के अभिवादन के बाद बोले- साथियों शासन के आदेशानुसार यह दो दिवसीय मीटिंग हो रही है, जिसमे हमें स्कूल चलो अभियान की ट्रेनिंग लेना है।


–तभी उनकी नज़र देर से मीटिंग में प्रवेश करते हुए एक शिक्षक मोहन शर्मा जी पर पड़ी, तो उन्हें देख चिल्लाकर बोले- मास्टर मोहन शर्मा ,यह कोई टाइम है मीटिंग में आने का? क्यों न इस अनुशासनहीनता के लिए आपका एक दिन का वेतन काटा जाए। आज आप लेट क्यों आये , इस बात का लिखित स्पस्टीकरण कल लेकर आना।


–मास्टर मोहन शर्मा जी बिना कुछ बोले सर झुकाए खड़े रहे,जब उन्होनें अपना सर सीधा किया , तब लोगों ने देखा कि उनकी आंखों में आंसू  थे।


– मीटिंग समाप्त होने पर प्रिंसिपल वर्मा जी ने अपने बड़े बाबू को बुलाकर एक दिन के वेतन काटने का आर्डर टाइप करने का आदेश दिया।


–उनका आदेश सुनकर बड़ा बाबू बोला-साहब जी,आप उनकी एक दिन का नही, एक महीने का वेतन भी रोकने का आदेश देंगे तो भी वह आपत्त्ति नही करेंगे।सिर झुकाकर आंसू बहाते रहेंगे। यह नौकरी उनकी कमजोरी भी है और मजबूरी भी है।


–प्रिंसिपल वर्मा जी बोले-

जो भी हो, अधिकारी लोग अक्सर दिमाग से काम लेते हैं, जो अधिकारी दिल से काम लेता है , वह अक्सर फेल हो जाता है।कल उनके एक दिन के वेतन काटने का आदेश  टाइप करके मेरे टेबल पर रख देना ।


–बड़े बाबू ने फिर कहा-

सर जी, एक-दो दिन रुक जाईये ,पहले जान लीजिए मामला क्या है ।


– तब प्रिंसिपल वर्मा बोले- देखिये बड़े बाबू, पेंडिंग काम एक लाश के समान होता है,जितनी देर करोगे उतनी ही सड़ांध होगी ,इसलिए काम हो जाना चाहिए जो मैंने कहा ।


–मीटिंग समाप्त होने बाद वर्मा जी अपने घर पहुंचे ,दरवाजे पर टकटकी लगाए उनके पिता बैठे थे।उनकी आंखें सवाल पूछ रही थीं कि आंखों का ड्रॉप्स लाए या नही लाए ?


–घर मे प्रवेश करते ही वर्मा जी ने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई औऱ उनके पास आने पर एक पेन ड्राइव देकर बोले- लीजिये तुम्हारी फरमाइश की नई फ़िल्म ।


वह बोलीं--

मैंने कब फरमाइस की थी जी ? चलो ले आये अच्छा किया, लेकिन आपके पापा तीन दिन से आंखों का ड्रॉप्स मांग रहे हैं, वह भी ले आते तो अच्छा होता ।

–वर्मा जी बोले-चलो,अब मूंड खराब मत करो। वो फ़िजूल की फरमाइश करते रहते हैं हमेशा ।चलो बैठकर साथ फ़िल्म देखें।

–अगले दिन वर्मा जी मीटिंग में जाने की तैयारी कर रहे थे कि तभी बड़े बाबू आ गए और मास्टर मोहन शर्मा के एक दिन के वेतन काटने के आदेश हस्ताक्षर हेतु उनके सामने रख दिया।

– वर्मा जी ने वह आदेश पढ़कर हस्ताक्षर कर के अपने पास रख लिया ।

 

–बड़े बाबू ने कहा- 

सर जी,अभी आप भी मीटिंग में जा रहे हैं, मुझे भी वही चलना है ,सर जी, आपकी शान के विरुध्द एक निवेदन है,अगर उचित समझें तो रास्ते मे मास्टर मोहन शर्मा जी का घर है,उनके पिता बहुत  बीमार हैं सिर्फ एक मिनिट उनको देखते हुए चलें? 

– वर्मा जी ने बहुत देर तक सोचने के बाद स्वीकृति दे दी, फिर क्या था, दोनों कुछ देर में ही शर्मा जी के घर पहुंच गए।

–मास्टर मोहन शर्मा अपने घर के बाहर अपने बीमार विकलांग पिता को स्नान करा रहे थे।

–अपने स्कूल के प्रिंसिपल को सामने पाकर शर्मा जी चौक पड़े औऱ हाथ जोड़कर बोले-

साहब जी,आप मेरे घर आये,मेरे अहोभाग्य, साहब जी, यह मेरे पिता जी हैं,इन्होंने  मजदूरी करके मुझे पाला है,इन्होंने पूरा जीवन मेरी परवरिश में लगा दिया।मुझे जवान करते-करते खुद बूढ़े हो गए। बिल्कुल आपके पिता के समान। आज यह बीमार हैं इसलिए मेरा भी फ़र्ज़ है कि इनकी सेवा करूँ। साहब जी , अब आप ही बताइए दुनियाँ की हर चीज खोने के बाद मिल सकती है, लेकिन अपने पिता को खो दिया तो फिर इनको सपने में भी पाना कठिन है। आप मेरा एक दिन का वेतन काट रहे हैं। मुझे जरा भी दुख नहीं है भले महीने भर का वेतन कट जाए, भूख लगेगी तो भीख मांग लूंगा,लेकिन अपने पिता की सेवा में जीवनभर कोई कमी नही कर सकता।

–यह सुनकर वर्मा जी ने वेतन काटने वाले आदेश को फाड़कर फेंक दिया, और मास्टर मोहन शर्मा के कांधे पर हाथ रखकर बोले-

शर्मा जी, आपकी पितृ-भक्ति के आगे मैं नममस्तक हूँ।

–फिर वर्मा जी मीटिंग में थोड़ी देर बैठे और उठकर वहां से सीधे अपने घर आ गए। वहां उन्होंने अपने पापा को इधर-उधर ढूंडा लेकिन वे नही मिले।

– तभी उनके पास किसी का मोबाइल कॉल आया-साहब जी, आपके पिता को कोई गाड़ी वाला टक्कर मार कर भाग गया, जल्दी आइए। वह अंतिम सांस गिन रहे है,


वर्मा जी तत्काल भागे, 


–उन्होंने देखा अस्पताल के जनरल वार्ड के बेड पर उनके पिता गम्भीर हालत में पड़े हुए हैं।

–वर्मा जी उनसे लिपट कर रो पड़े , और  बोले-

पापा जी, आप इस हाल में?


–लड़खड़ाती ज़ुबान में वह बोले-

बेटा, जब तुम्हारी माँ की मृत्यु हुई थी,तब तुम बहुत छोटे थे।लोगो मुझसे बहुत कहा कि दूसरी शादी कर लो। लेकिन मैंने अपना पूरा जीवन तुम्हें एक अच्छा इंसान बनाने में लगा दिया,लेकिन निश्चित ही मेरी परवरिश में कुछ कमी रह गई होगी ,अपनी आंख के इलाज के लिए मुझे अकेला अस्पताल आना पड़ा। अब मेरा अंतिम समय आ गया है,तुम्हें हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद देता हूँ।

– तब वर्मा जी हाथ जोड़कर बोले-पापा जी,मुझे माफी मांगना नही आता, लेकिन मुझे इतना पता है। आपको माफ करना आता है।प्लीज मुझे माफ़ कर दो।

–लेकिन जिसे माफ करना था वह दुनियाँ छोड़कर जा चुका था।

–वर्मा जी बिलखकर रो पड़े। तभी वहां मास्टर मोहन शर्मा ने आकर रुमाल से उनके आंसू  पोंछते हुए कहा-

साहब जी,हम अपने असहाय बुजुर्गों को खोने के बाद उनके उपकारों को याद करके रोते हैं। अगर उनके जीवनकाल मे ही उनके उपकारों को याद करते रहें तो कभी बाद में रोना या पछताना न पड़े।

–मानव भूल जाता है कि उनका वर्तमान काल भी कभी न कभी भूतकाल होगा।हमारे धर्म शास्त्र सदियों पहले ही लिख चुके हैं- 

–पितृ देवो भवः। 

यह असत्य नही है, लेकिन हम पुराणों के साथ नही ,ज़माने के साथ चलते हैं।

मुझे एक फिल्म की चांद लाइन याद आ गई...

" आज उँगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊँ...

   कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बूढ़ा हो  जाऊँ...”

शनिवार, 6 मई 2023

अपनी और दूसरों की मौत मे अंतर क्यों? अपनी और दूसरों की मौत मे अंतर क्यों?

 अपनी और दूसरों की मौत मे अंतर क्यों?



अपनी मृत्यु और अपनों की मृत्यु डरावनी लगती है। बाकी तो मौत को enjoy ही करता है आदमी ...


थोड़ा समय निकाल कर अंत तक पूरा पढ़ना 


 मौत के स्वाद का चटखारे लेता मनुष्य ...

थोड़ा कड़वा लिखा है पर मन का लिखा है ...


मौत से प्यार नहीं , मौत तो हमारा स्वाद है.....



बकरे का, 

गाय का,

भेंस का,

ऊँट का,

सुअर,

हिरण का,

तीतर का, 

मुर्गे का, 

हलाल का, 

बिना हलाल का, 

ताजा बकरे का, 

भुना हुआ,

छोटी मछली, 

बड़ी मछली, 


हल्की आंच पर सिका हुआ। न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के।

क्योंकि मौत किसी और की, और स्वाद हमारा....


स्वाद से कारोबार बन गई मौत। 

मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स।

नाम *पालन* और मक़सद *हत्या*❗ 

स्लाटर हाउस तक खोल दिये। वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नान वेज रेस्टॉरेंट, मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं ? मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नही है।


जो हमारी तरह बोल नही सकते, अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं...


उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ?


 कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ?

 या उनकी आहें नहीं निकलतीं ?


डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नही दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए ! 


बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ मे वो हडडी दिखाई नही देती, जो इससे पहले एक शरीर थी, जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, उसकी भी एक मां थी ...??

जिसे काटा गया होगा ? 

जो कराहा होगा ? 

जो तड़पा होगा ? 

जिसकी आहें निकली होंगी ? 

जिसने बद्दुआ भी दी होगी ?


कैसे मान लिया कि जब जब  धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो भगवान सिर्फ तुम इंसानों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे  ..❓


क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं हैं .❓


क्या उस ईश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं है  ..❓


धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो। कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो । 


कभी सोचा ...!!!

क्या ईश्वर का स्वाद होता है ? ....क्या है उनका भोजन ?


किसे ठग रहे हो ?

भगवान को ? 

अल्लाह को ?  

जीसस को?

या खुद को ?


मंगलवार को नानवेज नही खाता ...!!!

आज शनिवार है इसलिए नहीं ...!!!

अभी रोज़े चल रहे हैं ....!!!

नवरात्रि में तो सवाल ही नही उठता ....!!!


झूठ पर झूठ....

...झूठ पर झूठ।।