शनिवार, 15 जुलाई 2023

“बचपन के पन्ने”कविता इन हिंदी.

 “बचपन के पन्ने”कविता इन हिंदी.

“मढान”

पहले *भटूरे* को फुलाने के लिये 

उसमें *ENO* डालिये

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फिर *भटूरे* से फूले पेट को 

पिचकाने के लिये *ENO* पीजिये 

****************?

*जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य*

*आप कभी नहीं समझ पायेंगे*

*पांचवीं* तक *स्लेट* की बत्ती को *जीभ* से चाटकर ...

*कैल्शियम* की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी

*लेकिन*

इसमें *पापबोध* भी था कि कहीं  *विद्यामाता* नाराज न हो जायें ...!!!☺️

****

*पढ़ाई* के *तनाव* हमने 

*पेन्सिल* का पिछला हिस्सा 

चबाकर मिटाया था ...!!!😀

*पुस्तक* के बीच *पौधे की पत्ती* 

और *मोरपंख* रखने से हम 

*होशियार* हो जाएंगे ...

ऐसा हमारा *दृढ विश्वास* था. 😀


*कपड़े* के *थैले* में *किताब-कॉपियां*

जमाने का *विन्यास* हमारा 

*रचनात्मक कौशल* था ...!!!☺️🙏🏻


हर साल जब नई *कक्षा* के *बस्ते बंधते*

तब *कॉपी किताबों* पर *जिल्द* चढ़ाना,

हमारे जीवन का *वार्षिक उत्सव* मानते थे ...!!!☺️

***

*माता - पिता* को हमारी *पढ़ाई* की कोई *फ़िक्र* नहीं थी, न हमारी *पढ़ाई* 

उनकी *जेब* पर *बोझा* थी ...☺️💕

*सालों साल* बीत जाते पर *माता - पिता* के 

*कदम* हमारे *स्कूल* में न पड़ते थे ...!!!😀

*****

एक *दोस्त* को *साईकिल* के बीच वाले *डंडे* पर और *दूसरे* को *पीछे कैरियर* पर *बिठा* कर 

हमने कितने रास्ते *नापें* हैं, 

यह अब याद नहीं बस कुछ 

*धुंधली* सी *स्मृतियां* हैं ...!!!💕***


*स्कूल* में *पीटते* हुए और 

*मुर्गा* बनते हमारा *ईगो* 

हमें कभी *परेशान* नहीं करता था ..दरअसल हम जानते ही नही थे 

कि, *ईगो* होता क्या है❓️💕

*पिटाई* हमारे *दैनिक जीवन* की ...

*सहज सामान्य प्रक्रिया* थी😰😀

*पीटने वाला* और *पिटने वाला* दोनो *खुश* थे,

*पिटने वाला* इसलिए कि हम *कम पिटे*

*पीटने वाला* इसलिए *खुश* होता था ..

कि *हाथ साफ़* हुवा ...!!!😀

***

हम अपने *माता - पिता* को कभी नहीं बता पाए 

कि हम उन्हें कितना *प्यार* करते हैं, क्योंकि 

हमें *"आई लव यू"* कहना आता ही नहीं था ...!!!

😰😀💕

आज हम *गिरते- सम्भलते*, *संघर्ष*  करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, 

कुछ *मंजिल* पा गये हैं तो 

कुछ न जाने *कहां खो* गए हैं ...!!!😰


हम दुनिया में कहीं भी हों 

लेकिन यह सच है, 

हमे *हकीकतों* ने *पाला* है, 

हम सच की दुनियां में थे ...!!!

😰

*कपड़ों* को *सिलवटों* से बचाए रखना और *रिश्तों* को *औपचारिकता* से बनाए रखना..

 हमें कभी आया ही नहीं ...

इस मामले में हम सदा *मूर्ख* ही रहे ...!!!

😰

अपना अपना *प्रारब्ध* झेलते हुए 

हम आज भी *ख्वाब* बुन रहे हैं, 

शायद *ख्वाब बुनना* ही 

हमें *जिन्दा* रखे है वरना 

जो *जीवन* हम *जीकर* आये हैं 

उसके सामने यह *वर्तमान* कुछ भी नहीं ...!!!

😰

हम *अच्छे* थे या *बुरे* थे 

पर हम सब साथ थे *काश* 

वो समय फिर लौट आए ...!!!

😰😰

"एक बार फिर अपने *बचपन* के *पन्नो* 

को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे”...💕

  

और अंत में ...


हमारे *पिताजी* के समय में *दादाजी* गाते थे ...


[*मेरा नाम करेगा रोशन*

*जग में मेरा राज दुलारा*💕]

***

हमारे *ज़माने* में हमने गाया ...


[*पापा कहते है बड़ा नाम करेगा*💕]



अब *हमारे बच्चे* गा रहे हैं …

*****

[*बापू सेहत के लिए ...*

*तू तो हानिकारक है*। ]

😰😰


*सही / वास्तव* में हम 

*कहाँ से कहाँ* आ गए ...???😰


*एक बार मुड़ कर तो देखिये ...*😊🙏